Thursday, August 8, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

जहां तक पूर्वोत्तर राज्यों का सवाल है तो मेघालय पहले असम राज्य का हिस्सा था और बाद में उसे अलग राज्य का दर्जा दिया गया.
उसी तरह नागालैंड भी 1972 तक असम राज्य का ही हिस्सा था. पहले असम और नागालैंड ही थे जो पूर्वोत्तर में दो राज्य थे जबकि बाक़ी के इलाक़ों को केंद्र शासित रखा गया था जैसे मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा.
अब बात संविधान की छठी अनुसूची की करते हैं. ये वो इलाक़े हैं जहां स्थानीय आदिवासियों की आबादी काफ़ी ज़्यादा है. वहां इन जातियों के हिसाब से स्वायत्त शासित परिषदों की स्थापना की गयी है. इन इलाक़ों में भी राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है.
नागालैंड ने भी अलग राज्य के लिए काफ़ी संघर्ष किया और वो भी काफ़ी हिंसक तरीक़ों से. यहां संविधान की धारा 371A राज्य को शासन चलाने के लिए अलग शक्तियां प्रदान करती हैं जो स्थानीय रीति रिवाजों के अनुकूल हों.
जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उस पर पूर्वोत्तर राज्यों के संगठनों और नेताओं की भी नज़र है. असम की कृषक मुक्ति संग्राम समिति के अखिल गोगोई कहते हैं कि जम्मू कश्मीर के बाद पूर्वोत्तर भारत की बारी भी आ सकती है.
'मणिपुर ट्राइबल्स फोरम' के ओनिल क्षेत्रीयम ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि मणिपुर में हालात पहले से ही ख़राब चल रहे हैं.
अब यहां राष्ट्रीयता पंजीकरण सर्टिफिकेट का काम चल रहा है. उनका कहना है कि भारत में विविधता है और सरकार को उसका सम्मान करना चाहिए. वो कहते हैं कि एक ही लाठी से सबको हांका नहीं जा सकता और ना ही एक ही तरह से शासन चलाया जा सकता है.
हाल ही में मिज़ोरम राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री लाल थानवाला ने ट्वीट कर कहा कि जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वो पूर्वोत्तर राज्य के लोगों के लिए 'रेड अलर्ट' की स्थिति है.
उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, "जो जम्मू-कश्मीर में हुआ है वो ख़ासकर अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और नागालैंड जैसे प्रदेशों के लिए ख़तरा बन गया है. अगर संविधान की धारा 35 A, 370 और 371 G को निरस्त कर दिया जाता है तो मिज़ोरम के कमज़ोर आदिवासियों को इसका नुक़सान भुगतना पड़ेगा."
नागालैंड में तो राज्यपाल को इतनी संवैधानिक शक्ति दी गयी है कि वो मुख्यमंत्री तक के आदेश को निरस्त कर सकते हैं.
इस साल के आरंभ में नागालैंड तब चर्चा में आया जब राज्य के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने मंत्रिमंडल से प्रस्ताव पारित कर कहा कि 1955 वाला नागरिकता संशोधन बिल नागालैंड में लागू नहीं होगा.
वर्ष 2015 में हुए शांति समझौते के बारे में सब जानते हैं. ये समझौता केंद्र सरकार और आईज़ैक मुइवाह के नेतृत्व वाली 'नागालैंड सोशलिस्ट काउंसिल' के बीच हुआ था.
तब की केंद्र सरकार पर आरोप लगा कि वो नागालैंड के दबाव में आ गयी है. इस समझौते में कुल मिलाकर आठ बिंदु थे जिसमें राज्य के लिए अलग संविधान, अलग ध्वज और अलग पासपोर्ट की शर्त थी.
मेघालय में मातृसत्ता का बोलबाला है और ज़मीन घर की महिला के नाम पर ही होती है. यहां भी बाहर से आकर ज़मीन नहीं ख़रीदी जा सकती.
इसी वर्ष की शुरुआत में जब मुझे वहां जाने का मौक़ा मिला था तो कई ऐसे प्रवासी मज़दूरों से मुलाक़ात हुई. इन कामगारों ने बताया कि ज़मीन ख़रीदना तो दूर, यहां किराए पर मकान लेने के लिए भी सुरक्षा राशि के रूप में भारी रक़म देनी पड़ती है.
कभी कभी स्थानीय लोगों के हमलों का भी सामना करना पड़ता है.

Wednesday, July 31, 2019

#TripleTalaqBill: ऐतिहासिक फ़ैसला या ज़ुल्म का क़ानून?

पिछली एनडीए सरकार में अध्यादेश के ज़रिए लागू होने वाला तीन तलाक़ विधेयक मंगलवार को राज्यसभा में पास हो गया.
पिछली सरकार में लोकसभा में पारित होने के बाद विधेयक राज्यसभा में लंबित हो गया था. राज्यसभा में सरकार का बहुमत न होने के कारण इसे पास नहीं कराया जा सका था लेकिन, इस बार कुछ दलों के वॉकआउट करने की वजह से सरकार मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 को आसानी से पारित करवाने में सफल हो गई.
दोनों सदनों से पारित होने के बाद अब इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा जिसके बाद ये क़ानून बन जाएगा.
तीन तलाक़ विधेयक अपनी शुरुआत से ही विवादित रहा है. विपक्ष से लेकर कई सामाजिक संगठन इसका विरोध करते रहे हैं. इसे आपराधिक क़ानून बनाने और पति को सज़ा के प्रावधान को लेकर ख़ासतौर पर आपत्ति जताई गई है.
वहीं, इस विधेयक के पक्ष में भी कई लोग मौजूद हैं और तीन तलाक़ की पीड़ित मुसलमान महिलाओं की मदद के लिए इस पर क़ानून बनाया जाना ज़रूरी मानते हैं.
इस संबंध में दोनों पक्षों की राय जानने के लिए हमने ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर और एक मुस्लिम संगठन इमारत शरिया (बिहार) के महासचिव अनीसुर रहमान क़ासमी से बात की. पढ़िए, उनका नज़रिया:
तीन तलाक़ विधेयक का पास होना एक ऐतिहासिक जीत है. जो काम उलमाओं और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को करना चाहिए था वो सरकार ने किया.
तलाक़-ए-बिद्दत, जो अल्लाह को पसंद नहीं है उसको बढ़ावा दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के मना करने के बावजूद भी तीन तलाक़ होते रहे.
अब क़ानून बन जाने पर तीन तलाक़ देने वाले को बार-बार सोचना होगा.
भले ही इसमें आपराधिक मामले की बात है लेकिन ख़लीफ़ा उमर ने महिलाओं के सम्बन्ध में जो सौ कोड़े मारने की बात कही थी उसे असल में तीन तलाक़ के ज़रिए पूरा किया जा रहा था और तलाक़ की व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा था.
जिन लोगों ने तलाक़ की व्यवस्था का दुरुपयोग किया है ये उनके के लिए एक चेतावनी है. अब तलाक़-ए-बिद्दत नहीं होना चाहिए. जो भी तलाक़ हो वो क़ुरान पाक के हिसाब से काउंसिल के ज़रिए होना चाहिए. साथ ही औरतों में जो तलाक़ का डर बना रहता था अब वो ख़त्म हुआ है.
मैंने भी आपराधिक क़ानून न बनाए जाने की बात कही थी. जिस तरह हिंदू मैरिज एक्ट में जुर्माना और पहले साल भर के लिए अलग रहने का प्रवाधान है, उसी तरह इसमें भी हो सकता था.
साथ ही मैंने प्रधानमंत्री और क़ानून मंत्री से कहा था कि कोई भी ऐसा क़दम न उठाएं जिससे कोई शरीफ़ और ईमानदार शौहर भी फंस जाए. बीवी किसी के बहकावे में आकर कोई ग़लत क़दम उठा दे और शौहर के लिए मुश्किल खड़ी हो जाए. इससे मां-बाप अपने बेटे की शादी करने से डरेंगे.
इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए था कि उपाय ऐसे न हों जिनका ग़लत इस्तेमाल हो सके. लेकिन, अब क़ानून बन गया है तो उसे मानना ही होगा और महिलाओं को काफ़ी हद तक सहूलियत ज़रूर मिलेगी.
इस क़ानून से परेशानी होगी और मुसलमान महिलाओं की मुश्किलें बढ़ जाएंगी.
ये क़ानून शौहर को तीन साल के लिए जेल भेजने की बात कहता है. इस तरह तीन साल तक आपने बीवी को सड़क पर खड़ा कर दिया. उनके रहन-सहन का इंतज़ाम कौन करेगा? ये विधेयक महिलाओं के हक़ में बिल्कुल नहीं है.
दूसरी बात ये है कि दस्तूर में जो तलाक़ का हक़ दिया गया है उसके ख़िलाफ़ भी ये क़ानून है. इसलिए हम कहते हैं कि ये ज़ुल्म का क़ानून है.
शौहर को सज़ा की बात करें तो इस बिल के मुताबिक़ कोई अगर तीन तलाक़ बोल भी दे तो वो तलाक़ नहीं माना जाएगा. जब तलाक़ ही नहीं हुआ तो शौहर को सज़ा क्यों दे रहे हैं?
हम लोगों ने राय दी थी कि इस मामले में सामाजिक सुधार की ज़रूरत है और उसी तरीक़े से काम किए जाएं जिनसे समाज में बदलाव हो.
मुस्लिम महिलाएं तो 60 फ़ीसदी ऐसे ही ग़रीबी रेखा वाली ज़िंदगी गुज़ारती हैं और अगर तीन साल के लिए उसका शौहर जेल जाएगा तो उसका क्या होगा?
जब सरकार ख़ुद कहती है कि पूरे देश में तीन तलाक़ के 200 मामले आए तो मतलब है कि सामाजिक सुधार का काम हो रहा है.
सरकार इंतज़ार तो करे, सामाजिक सुधार का काम चंद दिनों में नहीं होता है. फिर सरकार ने ख़ुद इसके लिए क्या किया. क्या कभी विज्ञापनों और संदेशों के ज़रिए इस पर रोक की अपील की?
मुझे लगता है कि ये पूरी तरह राजनीतिक मामला है, न कि मुसलमान महिलाओं के भले के लिए ये किया गया है. इसमें विपक्ष ने भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई. कुछ राजनीतिक दलों ने राज्यसभा से वॉक आउट करके सरकार का समर्थन ही किया.

Monday, June 17, 2019

الغارديان: موقف ترامب من إيران قد يؤدي إلى صدمة نفطية

نشرت صحيفة الغارديان مقالا تحليليا كتبه، لاري إليوت، يرى فيه أن موقف ترامب المتشدد من إيران قد يؤدي إلى "صدمة نفطية في العالم".
ويقول لاري إن ارتفاع أسعار النفط بسبب التوتر في منطقة الشرق الأوسط يعيد إلى الذاكرة أزمة 1973، عندما أوقف ارتفاع أسعار النفط الازدهار الاقتصادي العالمي.
فقد كانت الدول الغربية تعودت على سعر دولارين لبرميل النفط فإذا بها خلال أسابيع اضطرت إلى دفع 11 دولارا للبرميل. وارتفعت نسبة التضخم، وتراجع النمو الاقتصادي، ووصلت البطالة إلى معدلات لم تصلها من الثلاثينات.
فقد أعادت الهجمات على ناقلات النفط في مضيق هرمز الأسبوع الماضي ذكريات عام 1973، عندما قررت الدول العربية استعمال النفط كسلاح اقتصادي أملا في أن يمارس الغرب ضغوطا على إسرائيل.
ويفسر الكاتب هجمات الأسبوع الماضي بأن طهران، التي يعاني اقتصادها من العقوبات الأمريكية، قررت أنه إذا أراد ترامب العبث بالاقتصاد الإيراني، فإنها ستعبث بالاقتصادي الأمريكي والعالمي.
وتنفي إيران ضلوعها في الهجمات، ولكن إذا كان هذا هو تفكيرها فإنها اختارت التوقيت المناسب.
ويرى الكاتب أن الأزمة التي قد تنفجر تشبه أكثر ما حدث في نهاية السبعينات عندما تضرر الاقتصاد العالمي بصدمة نفطية ثانية تسببت فيها الثورة الإيرانية.
ويقول إن استعمال البيت الأبيض للتعريفات الجمركية يجد صدى إيجابيا في أوساط قواعد ترامب الانتخابية ولكنه أدى إلى تراخي الاقتصاد العالمي، وزعزع ثقة الشركات.
ويضيف أن النصف الثاني من عام 2019 سيكون صعبا، وستلجأ الحكومات إلى إجراءات تحفيزية لمنع انتقال التراخي الاقتصادي إلى كساد. وقد تنجح هذه الإجراءات لمدة معينة، ولكنها لن تكون إلا علاجا مؤقتا.
والواقع أن الاقتصاد العالمي، حسب الكاتب، يترنح منذ سنوات. وأمامنا أزمة كبيرة، إذا لم تفجرها الاضطرابات في الخليج فإن أمرا آخر لابد ان يفجرها.
"ابتزاز"
ونشرت صحيفة التايمز مقالا افتتاحيا تقول فيه إن سياسات البيت الأبيض التجارية تضر بالاقتصاد العالمي وتضر بمصالح الأمريكيين أيضا.
وتقول الصحيفة إن الرئيس ترامب يعتقد أن الحروب التجارية مفيدة وأن الانتصار فيها من السهولة بمكان. ولكنها في الواقع غير مفيدة أبدا، لأنها تدمر الثروة.
وربما يعتقد المستثمرون مثلما يعتقد ترامب إن الولايات المتحدة ستسيطر في النهاية وبسهولة وأن شركاءها سيحجمون عن الرد عليها. ولكن الأحداث الأخيرة بينت أن سياسات ترامب ليست غريبة فحسب بل إنها خطر على الاقتصاد العالمي.
وتضيف التايمز أن الكونغرس وحلفاء الولايات المتحدة لابد أن يتدخلوا للتأكيد على ضرورة كبح جماح سياسات ترامب التجارية.
وكانت آخر مواقف ترامب الانعزالية هو تهديده الشهر الماضي بفرض رسوم بنسبة 5 في المئة على جميع السلع المستوردة من المكسيك، والتهديد أيضا برفعها تدريجيا.
وهذا في حذ ذاته منهج جديد في السياسات التجارية، لأن ما فعله ترامب لا ينسجم مع أي نظرية اقتصادية ولا علاقة لها بمزاعم التنافس غير العادل، بل إنه يتعلق بسياسة الحدود، واعتقد ترامب بان المكسيك لا تبذل ما بوسعها لتقليص الهجرة غير الشرعية إلى الولايات المتحدة.
وتراجع ترامب بعدها عن قراره، ولكنه تفكير خطير في السياسة الأمريكية. فإذا كانت الرسوم الجمركية تفرض بمشيئة الرئيس، فشركاء الولايات المتحدة لا يجدون فائدة في المفاوضات، والتوقيع على العقود والصفقات.
وتقول الصحيفة إن هذه الإجراءات أسوأ من تلك التي اتخذها ترامب بفرض رسوم جمركية على السلع المستوردة من المكسيك وكندا والاتحاد الأوروبي، لإنها إجراءات ليس لها أي مبرر اقتصادي.
وتضيف أنه إذا واصل ترامب بتدخلاته الأحادية الجانب والتعسفية في نظام التجارة الدولية، فإن مخاطر اندلاع حرب تجارية ستتزايد.
وتقول نيكول إن نشر السيرة الذاتية لزعيم كوريا الشمالية كشف النقاب عن الكثير من التفاصيل في حياة كيم جونغ أون الطفولية.
فقد قضى كيم جونغ أون طفولته في مجمع فاخر مغلق في العاصمة بيونغيانغ، وفي بيت العائلة على الشاطئ في مدينة وونسان.
وكان أبوه زعيم البلاد وقتها كيم جونغ إيل حريصا على أن يوفر له ألعاب الفيديو والأفلام التي نشأ عليها أطفال الغرب. وكان كيم جونغ أون حسب سيرته الذاتية مولعا بالطائرات والسفن، ولكنه كان يملك سيارة حقيقية، عدلها له والده ليقودها عندما كان عمره 7 أعوام. وكان يحمل مسدسا وعمره 11 عاما.
وعندما بلغ من العمر 12 عاما أرسله والده للدراسة إلى سويسرا. ويذكر بعض زملائه السابقين في الدراسة أن إمكانياته في تحصيل الدروس كانت محدودة وكان سريع الغضب. يشتبك مع زملائه ويضربهم أو يبصق عليهم إن تكلموا باللغة الألمانية التي لا يتقنها.
وكان يتجول في أوروبا بجواز سفر برازيلي مزور باسم جوزيف بواغ. وتظهر صور عائلية الشاب كيم جونغ أون يسبح في شواطئ فرنسا، ويأكل في مطاعم إيطاليا، ويزور ديزني لاند في باريس.

Tuesday, May 21, 2019

هل السكر ضروري للاستمتاع بكوب من الشاي؟

ربما تكون إضافة السكر لكوب الشاي أمرا معتادا بالنسبة للكثيرين، لكن العلماء يقولون إن الاستمتاع بتناوله لا يتطلب ذلك بالضرورة.
فقد توصلت دراسة بريطانية إلى أن المشاركين فيها تمكنوا من التخلص من السكر، دون أن يؤثر ذلك على استمتاعهم بالشاي، وهو ما يشير إلى أن تغيير سلوك استمر لفترة طويلة أمر ممكن.
وقال العلماء إن التوقف عن تناول السكر دفعة واحدة، أو الحد من تناوله بشكل تدريجي طريقتان فعالتان للحد من استهلاكه.
لكن معدي الدراسة أكدوا أن هناك حاجة إلى دراسة أوسع لتأكيد نتائجهم.
وقام فريق، يضم باحثين من كلية لندن الجامعية وجامعة ليدز، بتحليل بيانات على مدى شهر واحد عن 64 رجلا، اعتادوا تناول الشاي المحلى بالسكر.
وتم تقسيم المشاركين بالتساوي، إلى مجموعة من الرجال توقفوا عن تناول السكر في الشاي مرة واحدة، وآخرون خفضوا السكر تدريجيا على مدى أربعة أسابيع، ومجموعة ثالثة استمرت في تناول الشاي المحلى بالسكر.
وأشارت النتائج إلى أن الأشخاص، الذين خفضوا تناول السكر، كانوا لا يزالون قادرين على الاستمتاع بمذاق الشاي بدون السكر.
وفي نهاية الدراسة، تخلى 42 في المئة من أفراد مجموعة التخفيض التدريجي عن إضافة السكر إلى الشاي، وكذا فعل 36 في المئة من الذين توقفوا عن إضافته مرة واحدة.
واستغنى 6 في المئة من الرجال في المجموعة الثالثة عن السكر أيضا.
وخلص فريق الدراسة إلى أن "تقليل السكر في الشاي لا يؤثر على الرغبة فيه، ما يشير إلى أن تغيير السلوك طويل الأجل أمر ممكن".
وأضاف الباحثون أنه يمكن استخدام طرق مماثلة، للحد من تناول السكر في المشروبات الأخرى.
وتمت مراجعة نتائج الدراسة خلال المؤتمر الأوروبي للسمنة، في مدينة غلاسغو الاسكتلندية.
كانت جين مانشون وونغ (23 عاما) أول مَن يطّلع على تفاصيل خاصية جديدة للمواعدة والتعارف وفرها موقع فيسبوك، وذلك قبل الإعلان الرسمي عنها.
ويعد البحث عن الخصائص الجديدة للتطبيقات مجرد هواية للمهندسة الشابة جين وونغ، فهي لا تحقق مكاسب من أي سبق تنشره، رغم تلقيها عروض عمل لصالح مؤسسات إعلامية تستفيد من أخبارها.
لكن بعض ما تقدمه وونغ من أخبار يكون مهما لدرجة أنه يؤثر على سوق الأسهم.
فعندما أعلنت شركة فيسبوك، الربيع الماضي، عن خاصية جديدة للمواعدة، هبطت أسهم مجموعة ماتش غروب، التي تمتلك تطبيق المواعدة تندر وموقع ماتش.كوم، بنسبة تزيد عن 20 في المائة.
وحين نشرت المدونة الشابة، على صفحتها على تويتر، أول صورة للصفحة الرئيسية لموقع مواعدة فيسبوك  
على الرغم من كونها أحد قراصنة الكمبيوتر، إلا أنها تحاول تجنب المتاعب. حتى عندما كانت طفلة صغيرة، فإن حيلها كانت تميل إلى المزاح أكثر من كونها تشكل خطورة.
وقالت المدونة الشابة لصحيفة ساوث تشاينا مورنينغ بوست، إنها في بداية ممارستها للقرصنة كانت تتلاعب في برنامج يحسب سرعة الكتابة. ونجحت من خلال تغيير شفرة جافا سكريبت الأساسية، في اختراق البرنامج، وحققت المركز الأول في مسابقة على مستوى المدرسة.
وتدين جين مانشون وونغ، بالفضل لوالدها فيما يتعلق باهتمامها بالتكنولوجيا. ولا يعود ذلك لأنه شجعها على البرمجة، ولكن لأنه اضطرها لتعلم المهارات اللازمة حتى تتمكن من الوصول لكلمات السر التي كان يضعها لإغلاق كمبيوتر العائلة.
ومثلما كان يفعل والدها، يتعين على كبرى شركات صناعة التكنولوجيا في وادي السيليكون رفع مستوى الحماية لتجنب التعرض للاختراق من جانب أمثال هذه الشابة.
وقالت المدونة لبي بي سي: "منذ أن بدأت أحصل على بعض الاهتمام وبدأت الشركات في مراقبة تغريداتي، تعمل المزيد من الشركات على تحسين أمن تطبيقاتها".
وأضافت: "هذه إحدى النقاط التي تدفعني للقيام بهذا، فالشركات سوف تعمل على تحسين أمن التطبيق الخاص بها حتى يصعب اختراقه".
ضجة في وادي السيليكون
وتعرف الشابة أن أخبارها الحصرية تثير ضجة بين شركات التكنولوجيا، التي تقوم باختراقها بشكل منتظم.
فبعد نشرها صورة صفحة المواعدة الجديدة التابعة لفيسبوك، وجدت أن الشركة أضافت بسرعة شفرات خاصة منعتها من اقتناص المزيد من الصور باستخدام هاتفها.
وفي بعض الأحيان، تختفي سريعا الخصائص التي تعلنها عنها عبر حسابها، وهو ما حدث مع خاصية خرائط فيسبوك، بعد أن اكتشفت أنها تُظهر مواقع الأصدقاء القريبة.
كما اختفت صفحة عناوين الويب من فيسبوك، والتي كانت تكشف جميع شبكات "واي فاي"، المتاحة للجمهور في موقع معين، بعد أن نشرت تغريدة عنها.
بعد أشهر قليلة، واجهت عاصفة من التعليقات تتهمها بأنها كانت تتلاعب بالسوق من أجل تحقيق أرباح لنفسها.
وعلقت جين وونغ على هذا قائلة "لا يفهم الجميع الحوسبة وأمن المعلومات، وأحيانا يبالغ الناس في رد فعلهم عندما يرون ما أنشره".
وأوضحت أن هذه الاتهامات تسبب لها في "ثورة غضب" على تويتر. وقالت: "شعرت بالغضب الشديد".
واكتشفت أن شركة أير بي ان بي ( ) كانت تختبر خاصية جديدة تساعد على إرسال تنبيهات إلى المضيفين المشتركين بموقع الشركة لدى وصول طائرات ضيوفهم بأمان في المطارات.
وتشتهر جين مانشون وونغ، وهي مدونة متخصصة في التكنولوجيا، بالكشف عن خصائص جديدة في التطبيقات والمواقع، والإعلان عنها قبل تدشينها رسميا.
وتستطيع المدونة الشابة رصد خصائص جديدة لا تزال قيد التجربة تخص تطبيقات شهيرة مثل فيسبوك وانستغرام. وتنشر التصميمات ذات الصلة عبر حسابها على موقع تويتر، الذي يتابعه عن كثب صحفيون ينتظرون بشغف الحصول على سبق صحفي.
ولذا، بينما تسعى شركات التكنولوجيا الأمريكية في وادي السيليكون لإضفاء نوع من الإثارة عند الإعلان عن مميزات جديدة لمنتجاتها، تكرس مهندسة البرمجيات المقيمة في هونغ كونغ جهدها لتعكر صفوهم.

Monday, May 6, 2019

इसराइल-फ़लस्तीनी हिंसाः संघर्षविराम की कोशिशें भीषण झड़पें जारी

मिस्र और संयुक्त राष्ट लंबे समय के लिए संघर्ष विराम की कोशिश कर रहे थे. इसी बीच ग़ज़ा पट्टी पर झड़पें कम होने की ख़बरें भी आई हैं.
लेकिन हाल के वर्षों में ये सबसे भीषण झड़पे बताई जा रही हैं जिसमें दो दिन में चार इसराइली और 23 फ़लस्तीनियों की मौत हो गई है.
हमास टीवी स्टेशन की एक अपुष्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि संघर्षविराम के लिए दोनों पक्षों की सहमति थी लेकिन इसराइल की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय देशों ने शांति बनाए रखने की अपील की है.
इसराइल की आर्मी ने रविवार को कहा कि शनिवार से अब तक इसराइली क्षेत्र में 600 से भी अधिक रॉकेट दाग़े हैं जबकि उन्होंने इसके जवाब में 320 ठिकानों को निशाना बनाया.
रिपोर्ट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र, क़तर और मिस्र संघर्षविराम के लिए समझौता तलाश रहे थे. सोमवार सुबह फ़लस्तीनी अधिकारियों ने बताया कि एक समझौता हुआ है.
हमास और मिस्र के अधिकारियों ने एएफपी एजेंसी को बताया कि संघर्षविराम पर सहमति बन गई है.
रविवार को इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कहा कि उन्होंने ग़ज़ा पट्टी में आतंकवादियों के ठिकानों पर बड़े हमले के आदेश दिए हैं.
नेतन्याहू ने कहा कि ग़ज़ा में इसराइली सेना पूरी तैयारी के साथ तैनात है. पिछले महीने संघर्षविराम पर सहमति के बाद भी संघर्ष जारी है. मिस्र और संयुक्त राष्ट्र लंबे समय के लिए संघर्षविराम की कोशिश कर रहे थे.
शुक्रवार को ग़ज़ा में नाकेबंदी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हो रहा था. इसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की. इसराइल का कहना है कि वो चरमपंथियों के पास हथियारों को पहुँचने से रोकना चाहता है.
इसी प्रदर्शन में एक फ़लस्तीनी बंदूक़धारी ने दो इसराइली सैनिकों को सरहद पर लगी बाड़ के पास गोली मारकर ज़ख़्मी कर दिया था. इसके बाद इसराइल ने हवाई हमला कर दो चरमपंथियों को मार दिया. इसके बाद से दोनों तरफ़ से हमले जारी हैं. इसमें इसराइल के कुछ गांव भी प्रभावित हुए हैं.
उत्तरी ग़ज़ा से 10 किलोमीटर दूर अशकेलोन के अस्पताल में पिछले 24 घंटों में 100 नागरिकों को इलाज के लिए भर्ती किया गया है. इनमें से तीन की मौत हो गई है और तीन गंभीर रूप से ज़ख़्मी हैं.
चुनाव आयोग ने रमज़ान के दिनों में मतदान के लिए समय में किसी बदलाव से इनकार कर दिया है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में वकील मोहम्मद निज़ामुद्दीन पाशा और असद हयात ने रमज़ान में पड़ने वाले तीन चरण के मतदान के समय में बदलाव के लिए याचिका दायर की थी.
इस याचिका में कहा गया था कि भीषण गर्मी और रमज़ान के उपवास को देखते हुए मतदान सुबह सात बजे के बजाए सुबह साढ़े चार या पांच बजे से कराना चाहिए ताकि लोगों को कम मुश्किलें आएं.
भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने पिछले गुरुवार को चुनाव आयोग से इस मामले पर फैसला लेने का कहा था. लेकिन चुनाव आयोग ने बाक़ी के तीन चरणों में मतदान के समय सीमा में किसी बदलाव से इनकार किया है.
चुनाव आयोग के मुताबिक़ कोशिश की गई है कि चुनाव शुक्रवार को नहीं पड़े लेकिन समय सीमा में बदलाव करना संभव नहीं है.
भारत में रमज़ान मंगलवार से शुरू हो रहे हैं.
मोदी सरकार का पांच साल में ख़राब प्रदर्शन- मनमोहन सिंह
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मोदी सरकार के पांच साल के कामकाज की आलोचना की है.
समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में मनमोहन सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर मोदी सरकार का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है क्योंकि पांच सालों में आतंकवाद की घटनाएं काफ़ी बढ़ी हैं.
उन्होंने मोदी सरकार के कार्यकाल को युवाओं, किसानों, व्यापारियों और हर संवैधानिक संस्था के लिए दर्दनाक और विनाशकारी बताया.

Thursday, April 25, 2019

में तेज धूप के बीच राजनबेन

वहीं मोदी ने इसे अपने पक्ष में प्रचारित करने का कोई मौका नहीं गंवाया. उन्होंने ऐलान कर दिया, "देश सुरक्षित हाथों में है." ये मोदी के लिए किसी जीत से कम साबित नहीं हुआ और इसकी कई वजहें भी सामने हैं.
मोदी को पसंद करने वाली रेटिंग
इतने शानदार बहुमत के बावजूद मोदी के कामकाज को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दिख रही हैं. कुछ मामलों में फ़ायदा हुआ है, ज़्यादा सड़कें बन गई हैं, ग्रामीण विकास हुआ है, लोगों को सस्ती रसोई गैस दी गई है, गांवों में शौचालय बन गए हैं. एक समान बिक्री कर यानी जीएसटी लागू हो गया है.
इतना ही नहीं पचास करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा देने के लक्ष्य के साथ स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू हुई है और दिवालिया को लेकर नया कानून भी बना है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है.
खेती किसानी कर रहे लोगों को अपने फसल का मामूली दाम मिल रहा है. याद रहे कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेतीबाड़ी से जुड़ा हुआ है. देश में बेरोज़गारी बढ़ रही है और विवादास्पद नोटबंदी से ग़रीबों को काफी नुक़सान हुआ है.
वहीं, सामाजिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी के उग्र हिंदू राष्ट्रवाद से देश में ध्रुवीकरण बढ़ा है और अल्पसंख्यक घबराए हुए हैं. इसके साथ-साथ भारत फ़ेक न्यूज़ की महामारी की चपेट भी आ गया है.
अलग राय रखने वालों को राष्ट्रद्रोही बताने और इस आरोप में जेल भेजने तक का चलन बढ़ा है. इन सबके बीच नरेंद्र मोदी एक निर्णायक आम चुनाव का सामना कर रहे हैं.
कुछ मामलों में ये एक तरह से मोदी पर जनमत संग्रह होने वाला है. कई लोगों का मानना है कि मोदी भारत की छवि को इस रूप में ढालना चाहते हैं- 'राष्ट्रवादी', 'सामाजिक तौर पर संकीर्ण' और 'खुले तौर पर देशभक्त.'
बहरहाल 11 अप्रैल से 19 मई तक, क़रीब 40 दिनों तक चलने वाले मैराथन चुनाव में तकरीबन 90 करोड़ लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
ये भी कहा जा रहा है कि ये देश का सबसे बड़ा, सबसे लंबे समय तक चलने वाला और सबसे महंगा चुनाव साबित होने वाला है.
लेकिन सवाल वही है, जैसा कुछ लोग पूछ भी रहे हैं, "क्या ये चुनाव भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है?"
गुजरात के वडोदरा की गलियों में तेज धूप के बीच राजनबेन धनंजय भट्ट का चुनावी अभियान जोरों पर दिखा. 56 साल की भट्ट यहां बीजेपी की उम्मीदवार हैं. वे काली चमचमाती जीप की छत से बाहर निकलकर हाथ जोड़े लोगों का अभिवादन कर रही हैं.
उनका स्वागत करने के लिए बड़ी संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे इकट्ठा हुए हैं. ये लोग उन्हें माला पहना रहे हैं, आशीर्वाद दे रहे हैं और घर में बनी मिठाइयां और जूस भी ऑफर कर रहे हैं.
जब भट्ट जीत का निशान बनाती हैं तो गली के मकानों और छतों से उन्हें उत्साहवर्धक जवाब मिलता है. पूरी गली भगवा रंग में डूबी नजर आती है. भगवा साफा बांधे, टोपी पहने, रुमाल बांधे, गमछा लगाए मोटरसाइकिल पर सवार युवा भट्ट की रैली के आगे-आगे चल रहे हैं.
एक ट्रक भी साथ में था जिसमें डीजे तेज धुनों पर संगीत बजा रहा था और आतिशबाज़ी भी देखने को मिली. कोलाहल के इस उत्सव में हर ओर से एक ही आवाज़ गूंजती है.
पार्टी के युवा समर्थक उन्मादी एक स्वर से "मोदी, मोदी, मोदी" के नारे लगा रहे हैं. ये नारे देखते-देखते बीजेपी के 2019 के चुनावी अभियान की गीत से मिल जाते हैं, ये गीत है, "मोदी है तो मुमकिन है."
पिछले कुछ समय से राज्यों में चुनाव हारने के चलते गिरावट की ओर थी. उसमें तेजी से सुधार देखने को मिला.
मोदी साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने अपने नेतृत्व में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बात करने वाली बीजेपी को शानदार जीत दिलाई. साल 1984 के बाद ये पहला मौका था जब किसी पार्टी को आम चुनावों में बहुमत हासिल हुआ था.

Friday, April 12, 2019

पाकिस्तानः क्वेटा में धमाका, 20 की मौत, कई घायल

पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा के हज़ारगंज इलाक़े में हुए एक आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 20 लोग मारे गए हैं और 40 के करीब घायल बताए जा रहे हैं.
स्थानीय पुलिस के मुताबिक़ ये धमाका सुबह क़रीब आठ बजे (पाकिस्तान वक़्त के मुताबिक़) हज़ारगंज इलाक़े की सब्ज़ी मंडी में हुआ है.
समाचार एजेंसी एपीपी के मुताबिक़ पुलिस का कहना है कि धमाका बाज़ार में खड़ी पुलिस वैन को निशाना बनाकर किया गया.
डीआईजी पुलिस अब्दुल रज़्ज़ाक़ चीमा ने पत्रकारों से कहा, "इस हमले में कुल 20 लोग मारे गए हैं जिनमें से आठ हज़ारा समुदाय से हैं. एक जवान है और बाक़ी लोग मंडी में काम करने वाले हैं.".
धमाके के बारे में उन्होंने बताया, "सुरक्षाबलों की एक गाड़ी सब्ज़ी मंडी में जब आलू की एक दुकान के सामने पहुंची तब ये धमाका हुआ."
उन्होंने कहा, "धमाका आईईडी है या फिर कुछ और ये जांच के बाद पता चलेगा."
जब उनसे पूछा गया कि क्या ये आत्मघाती धमाका था तो उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है.
ये धमाका आलुओं के एक गोदाम के बाहर हुआ है. जिस समय धमाका हुआ उस समय यहां लोग काम कर रहे थे.
धमाके के बाद सुरक्षाबलों ने इलाक़े को घेरे में ले लिया है. बम निरोधक दस्ता भी मौक़े पर भेजा गया है.
इस धमाके में कई लोग घायल भी हुए हैं जिन्हें अस्पताल पहुंचाया गया है.
पुलिस के मुताबिक़ हज़ारगंज में हज़ारा शिया समुदाय से जुड़े लोग रहते हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ मारे गए और घायल हुए अधिकतर लोग इसी समुदाय से हैं.
पाकिस्तान में हज़ारा शिया लोगों को निशाना बनाकर पहले भी हमले किए जाते रहे हैं.
विकीलीक्स के संस्थापक जुलियन असांज को गुरुवार को लंदन में इक्वाडोर के दूतावास से गिरफ़्तार कर लिया गया है जहाँ उन्होंने पिछले सात साल से शरण ली थी.
असांज ने साल 2012 से इस दूतावास में शरण ली हुई थी.
गुरुवार को असांज को वेस्टमिंस्टर कोर्ट में पेश किया गया जहां वे कोर्ट के सामने सरेंडर ना करने के दोषी पाए गए.
असांज ने अमरीकी सरकार से जुड़ा एक बड़ा ख़ुलासा किय था जिसके बाद उन पर अमरीकी सरकार के खिलाफ़ षड्यंत्र के आरोप हैं.
अमरीका के जस्टिस डिपार्टमेंट का आरोप है कि असांज ने पूर्व अमरीकी इंटेलीजेंस विश्लेषक चेल्सी मैनिंग की मदद से गोपनीय दस्तावेज़ डाउनलोड किए.
अगर असांज पर लगे ये आरोप सिद्ध होते हैं तो अमरीका में उन्हें पांच साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
ब्रिटेन की सरकार को ये तय करना है कि वह जुलियन असांज के प्रत्यर्पण को मंज़ूरी देंगे या नहीं.
असांज की वकील जेनिफ़र रॉबिनसन ने कहा है कि वह इस प्रत्यर्पण का विरोध करेंगी.
उन्होंने कहा, ''प्रत्यर्पण की मांग के ख़िलाफ़ हूं, अगर कोई पत्रकार अमरीका के ख़िलाफ़ दस्तावेज़ के ज़रिए सच सामने लाता है तो उसे अमरीकी सरकार के आरोप झेलने होंगे. ये एक बेहद ख़तरनाक मिसाल साबित होगा.''
असांज पहले भी ये बोल चुके हैं कि अगर वो दूतावास से बाहर निकलेंगे तो उनका प्रत्यर्पण किया जा सकता है.