Thursday, April 25, 2019

में तेज धूप के बीच राजनबेन

वहीं मोदी ने इसे अपने पक्ष में प्रचारित करने का कोई मौका नहीं गंवाया. उन्होंने ऐलान कर दिया, "देश सुरक्षित हाथों में है." ये मोदी के लिए किसी जीत से कम साबित नहीं हुआ और इसकी कई वजहें भी सामने हैं.
मोदी को पसंद करने वाली रेटिंग
इतने शानदार बहुमत के बावजूद मोदी के कामकाज को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दिख रही हैं. कुछ मामलों में फ़ायदा हुआ है, ज़्यादा सड़कें बन गई हैं, ग्रामीण विकास हुआ है, लोगों को सस्ती रसोई गैस दी गई है, गांवों में शौचालय बन गए हैं. एक समान बिक्री कर यानी जीएसटी लागू हो गया है.
इतना ही नहीं पचास करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य बीमा देने के लक्ष्य के साथ स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू हुई है और दिवालिया को लेकर नया कानून भी बना है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है.
खेती किसानी कर रहे लोगों को अपने फसल का मामूली दाम मिल रहा है. याद रहे कि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेतीबाड़ी से जुड़ा हुआ है. देश में बेरोज़गारी बढ़ रही है और विवादास्पद नोटबंदी से ग़रीबों को काफी नुक़सान हुआ है.
वहीं, सामाजिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी के उग्र हिंदू राष्ट्रवाद से देश में ध्रुवीकरण बढ़ा है और अल्पसंख्यक घबराए हुए हैं. इसके साथ-साथ भारत फ़ेक न्यूज़ की महामारी की चपेट भी आ गया है.
अलग राय रखने वालों को राष्ट्रद्रोही बताने और इस आरोप में जेल भेजने तक का चलन बढ़ा है. इन सबके बीच नरेंद्र मोदी एक निर्णायक आम चुनाव का सामना कर रहे हैं.
कुछ मामलों में ये एक तरह से मोदी पर जनमत संग्रह होने वाला है. कई लोगों का मानना है कि मोदी भारत की छवि को इस रूप में ढालना चाहते हैं- 'राष्ट्रवादी', 'सामाजिक तौर पर संकीर्ण' और 'खुले तौर पर देशभक्त.'
बहरहाल 11 अप्रैल से 19 मई तक, क़रीब 40 दिनों तक चलने वाले मैराथन चुनाव में तकरीबन 90 करोड़ लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
ये भी कहा जा रहा है कि ये देश का सबसे बड़ा, सबसे लंबे समय तक चलने वाला और सबसे महंगा चुनाव साबित होने वाला है.
लेकिन सवाल वही है, जैसा कुछ लोग पूछ भी रहे हैं, "क्या ये चुनाव भारत की आत्मा को बचाने की लड़ाई है?"
गुजरात के वडोदरा की गलियों में तेज धूप के बीच राजनबेन धनंजय भट्ट का चुनावी अभियान जोरों पर दिखा. 56 साल की भट्ट यहां बीजेपी की उम्मीदवार हैं. वे काली चमचमाती जीप की छत से बाहर निकलकर हाथ जोड़े लोगों का अभिवादन कर रही हैं.
उनका स्वागत करने के लिए बड़ी संख्या में पुरुष, महिलाएं और बच्चे इकट्ठा हुए हैं. ये लोग उन्हें माला पहना रहे हैं, आशीर्वाद दे रहे हैं और घर में बनी मिठाइयां और जूस भी ऑफर कर रहे हैं.
जब भट्ट जीत का निशान बनाती हैं तो गली के मकानों और छतों से उन्हें उत्साहवर्धक जवाब मिलता है. पूरी गली भगवा रंग में डूबी नजर आती है. भगवा साफा बांधे, टोपी पहने, रुमाल बांधे, गमछा लगाए मोटरसाइकिल पर सवार युवा भट्ट की रैली के आगे-आगे चल रहे हैं.
एक ट्रक भी साथ में था जिसमें डीजे तेज धुनों पर संगीत बजा रहा था और आतिशबाज़ी भी देखने को मिली. कोलाहल के इस उत्सव में हर ओर से एक ही आवाज़ गूंजती है.
पार्टी के युवा समर्थक उन्मादी एक स्वर से "मोदी, मोदी, मोदी" के नारे लगा रहे हैं. ये नारे देखते-देखते बीजेपी के 2019 के चुनावी अभियान की गीत से मिल जाते हैं, ये गीत है, "मोदी है तो मुमकिन है."
पिछले कुछ समय से राज्यों में चुनाव हारने के चलते गिरावट की ओर थी. उसमें तेजी से सुधार देखने को मिला.
मोदी साल 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने, उन्होंने अपने नेतृत्व में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की बात करने वाली बीजेपी को शानदार जीत दिलाई. साल 1984 के बाद ये पहला मौका था जब किसी पार्टी को आम चुनावों में बहुमत हासिल हुआ था.

Friday, April 12, 2019

पाकिस्तानः क्वेटा में धमाका, 20 की मौत, कई घायल

पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा के हज़ारगंज इलाक़े में हुए एक आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 20 लोग मारे गए हैं और 40 के करीब घायल बताए जा रहे हैं.
स्थानीय पुलिस के मुताबिक़ ये धमाका सुबह क़रीब आठ बजे (पाकिस्तान वक़्त के मुताबिक़) हज़ारगंज इलाक़े की सब्ज़ी मंडी में हुआ है.
समाचार एजेंसी एपीपी के मुताबिक़ पुलिस का कहना है कि धमाका बाज़ार में खड़ी पुलिस वैन को निशाना बनाकर किया गया.
डीआईजी पुलिस अब्दुल रज़्ज़ाक़ चीमा ने पत्रकारों से कहा, "इस हमले में कुल 20 लोग मारे गए हैं जिनमें से आठ हज़ारा समुदाय से हैं. एक जवान है और बाक़ी लोग मंडी में काम करने वाले हैं.".
धमाके के बारे में उन्होंने बताया, "सुरक्षाबलों की एक गाड़ी सब्ज़ी मंडी में जब आलू की एक दुकान के सामने पहुंची तब ये धमाका हुआ."
उन्होंने कहा, "धमाका आईईडी है या फिर कुछ और ये जांच के बाद पता चलेगा."
जब उनसे पूछा गया कि क्या ये आत्मघाती धमाका था तो उन्होंने कहा कि जांच के बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है.
ये धमाका आलुओं के एक गोदाम के बाहर हुआ है. जिस समय धमाका हुआ उस समय यहां लोग काम कर रहे थे.
धमाके के बाद सुरक्षाबलों ने इलाक़े को घेरे में ले लिया है. बम निरोधक दस्ता भी मौक़े पर भेजा गया है.
इस धमाके में कई लोग घायल भी हुए हैं जिन्हें अस्पताल पहुंचाया गया है.
पुलिस के मुताबिक़ हज़ारगंज में हज़ारा शिया समुदाय से जुड़े लोग रहते हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ मारे गए और घायल हुए अधिकतर लोग इसी समुदाय से हैं.
पाकिस्तान में हज़ारा शिया लोगों को निशाना बनाकर पहले भी हमले किए जाते रहे हैं.
विकीलीक्स के संस्थापक जुलियन असांज को गुरुवार को लंदन में इक्वाडोर के दूतावास से गिरफ़्तार कर लिया गया है जहाँ उन्होंने पिछले सात साल से शरण ली थी.
असांज ने साल 2012 से इस दूतावास में शरण ली हुई थी.
गुरुवार को असांज को वेस्टमिंस्टर कोर्ट में पेश किया गया जहां वे कोर्ट के सामने सरेंडर ना करने के दोषी पाए गए.
असांज ने अमरीकी सरकार से जुड़ा एक बड़ा ख़ुलासा किय था जिसके बाद उन पर अमरीकी सरकार के खिलाफ़ षड्यंत्र के आरोप हैं.
अमरीका के जस्टिस डिपार्टमेंट का आरोप है कि असांज ने पूर्व अमरीकी इंटेलीजेंस विश्लेषक चेल्सी मैनिंग की मदद से गोपनीय दस्तावेज़ डाउनलोड किए.
अगर असांज पर लगे ये आरोप सिद्ध होते हैं तो अमरीका में उन्हें पांच साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
ब्रिटेन की सरकार को ये तय करना है कि वह जुलियन असांज के प्रत्यर्पण को मंज़ूरी देंगे या नहीं.
असांज की वकील जेनिफ़र रॉबिनसन ने कहा है कि वह इस प्रत्यर्पण का विरोध करेंगी.
उन्होंने कहा, ''प्रत्यर्पण की मांग के ख़िलाफ़ हूं, अगर कोई पत्रकार अमरीका के ख़िलाफ़ दस्तावेज़ के ज़रिए सच सामने लाता है तो उसे अमरीकी सरकार के आरोप झेलने होंगे. ये एक बेहद ख़तरनाक मिसाल साबित होगा.''
असांज पहले भी ये बोल चुके हैं कि अगर वो दूतावास से बाहर निकलेंगे तो उनका प्रत्यर्पण किया जा सकता है.

Tuesday, April 2, 2019

साल-दर-साल सभी राजनीतिक दल चाय बगान

असम ऐसा राज्य है जहां केवल धान की ही 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनकी पारंपरिक रूप से खेती होती रही है. चावल की इन प्रजातियों में से कई लुप्त होने के कगार पर ज़रूर हैं, मगर इनको बचाने के प्रयास भी हो रहे हैं.
सिलापथार साइंस कालेज के प्रिंसिपल रंजीत सैकिया का कहना है कि सदियों से असम के किसान, धान के स्थानीय बीज का उत्पादन करते रहे थे लेकिन कुछ सालों से वो बस एक या दो प्रजाति के धन की फसल ही उपजाते हैं. इसलिए कॉलेज ने ऐसे ही बीजों का बैंक बनाया है ताकि धान की ये प्रजातियाँ संरक्षित रह पाएं.
वे कहते हैं, “ये धान असम के पारंपरिक उत्पाद हैं और ये कई प्रकार के हैं. हमने जो बैंक बनाया है उससे हम बीज विकसित कर स्थानीय किसानों में बाँट रहे हैं और उन्हें इनकी खेती करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. अगर इन प्रजातियों को किसान उगाने लगते हैं तो फिर हम इनका निर्यात भी कर सकते हैं और यहाँ का किसान ख़ुशहाल हो सकता है."
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिली चुनावी हार के बाद असम भारतीय जनता पार्टी शासित पहला ऐसा राज्य है जिसने किसानों के लिए क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की है.
इस क़र्ज़ माफ़ी की योजना को पथुराघाट की घटना के नाम पर बनाया गया है. असम सरकार के प्रवक्ता और मंत्री सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस योजना के तहत उन किसानों का 25 प्रतिशत कर्ज़ माफ़ किया जाएगा जो 75 प्रतिशत क़र्ज़ बैंकों को लौटा देंगे.
असम सरकार के वित्त मंत्री हेमंता बिस्वासरमा के अनुसार राज्य के सिर्फ़ 19 लाख किसानों को ही किसान क्रेडिट कार्ड का फ़ायदा मिल पा रहा है जबकि सरकारी आंकड़ों में राज्य में किसानों की संख्या 27 लाख बताई जाती है. नई क़र्ज़ माफ़ी की योजना के लिए सरकार के खज़ाने से 500 करोड़ रुपये खर्च होने हैं.
लेकिन जानकार मानते हैं कि क़र्ज़ माफ़ी की इस योजना से किसानों को ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि कहते हैं, "किसी ने एक लाख रुपये क़र्ज़ लिया और उसकी फसल किसी वजह से पूरी की पूरी बर्बाद हो गई तो वो क्या करेगा. वो क़र्ज़ के 75 हज़ार रुपये वापस करने की स्थिति में रहेगा, तब तो 25 प्रतिशत माफ़ी के लिए आवेदन देगा, जिसकी पूरी फ़सल बर्बाद हो गई वो कहाँ से क़र्ज़ चुका पायेगा?"
असम के किसानों का संघर्ष बहुत पुराना है. वर्ष 1894 में यहाँ के दर्रांग ज़िले के पथुराघाट में किसानों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन किया था. तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत ने इस आंदोलन को बुरी तरह कुचल दिया था. इस संघर्ष में 140 किसान मारे गए थे जबकि 150 किसान घायल हुए थे.
हालांकि किसानों की ये कुर्बानी इतिहास के पन्नों में अपनी कोई जगह नहीं बना पाई और देश के बाक़ी के हिस्सों में इसकी कोई चर्चा नहीं सुनाई देती. ये पंजाब के जालियांवाला बाग़ के जैसा ही आंदोलन था. पथुराघाट आंदोलन की पृष्ठभूमि 1826 से ही शुरू हो गई थी जिसके पीछे 'यंदाबो समझौता' है.
पथुराघाट के निवासी और पत्रकार भार्गब कुमार दास बताते हैं कि इस समझौते के तहत बर्मा ने असम, मणिपुर और इसके आस पास के इलाकों का नियंत्रण ब्रितानी हुकूमत को सौंप दिया था.
इस समझौते के बाद क्षेत्र में 'अहोम राजाओं' के शासन की समाप्ति की घोषणा की गई. जब अंग्रेज़ों ने इलाके की हुकूमत संभाली तो उन्होंने किसानों पर लगान बढ़ा दी. ब्रितानी हुकूमत के इस फैसले के बाद ऊपरी असम में किसानों का ज़ोरदार विरोध शुरू हो गया. राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने पथुराघाट की घटना को मानो भुला ही दिया था.
मगर वर्ष 2000 में भारतीय सेना ने इन शहीद किसानों की याद में एक स्मारक बनाया. वो भी तत्कालीन राज्यपाल जनरल एसके सिन्हा की पहल पर, तब से लेकर आज तक, हर साल 29 जनवरी को भारतीय सेना इन किसानों को श्रद्धांजलि देती आ रही है.
सवाल उठता है कि क्यों इतने सालों के बाद भी असम के किसान संघर्ष ही कर रहे हैं?
असम की राजधानी गुवाहाटी की व्यस्त चाय गली में आज भी रोज़ की तरह ही हलचल है. यहां रिक्शा और ठेलों का लंबा जाम लगा है, और राहगीरों की लंबी कतारें हैं. लोग यहाँ चाय की चुस्कियां लेने दूर-दूर से आते हैं. अलग-अलग ज़ायके की चाय इस जगह की पहचान है.
पास ही में है चाय की पत्तियों का थोक बाज़ार. यहीं से पैक होकर आपकी पसंदीदा चाय आप तक पहुँचती है. देश के कोने-कोने से चाय के व्यापारी इस चाय गली की थोक की दुकानों में आते हैं और अपना ऑर्डर देकर चले जाते हैं. फिर ये थोक विक्रेता उन तक चाय पत्ती पहुंचाते हैं.
हालांकि चाय का ये सफ़र उतना आसान भी नहीं है जितनी आसानी से हम अपनी प्याली की चाय गटक जाते हैं. लगभग दस लाख चाय के मज़दूरों की मेहनत के बाद ही हम तक ये पत्तियां पहुँच पाती है.
पहाड़ों और झरनों की गोद में फैले असम के चाय के बगान इस राज्य की प्राकृतिक सुंदरता को निखारते हैं. असम का नाम आते ही दिमाग़ में यहाँ के चाय बगानों की खू़बसूरती और सांस्कृतिक परंपरा की तस्वीर बनने लगती है.
मगर पिछले कई सालों से असम के इन चाय के बगानों में एक असंतोष पनप रहा है. ये असंतोष है मजू़रों का, जो न्यूनतम मज़दूरी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं.