असम ऐसा राज्य है जहां केवल धान की ही 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिनकी पारंपरिक रूप से खेती होती रही है.
चावल की इन प्रजातियों में से कई लुप्त होने के कगार पर ज़रूर हैं, मगर इनको
बचाने के प्रयास भी हो रहे हैं.
सिलापथार साइंस कालेज के प्रिंसिपल रंजीत सैकिया का कहना है कि सदियों से असम के किसान, धान के स्थानीय बीज का उत्पादन करते रहे थे लेकिन कुछ सालों से वो बस एक या दो प्रजाति के धन की फसल ही उपजाते हैं. इसलिए कॉलेज ने ऐसे ही बीजों का बैंक बनाया है ताकि धान की ये प्रजातियाँ संरक्षित रह पाएं.
वे कहते हैं, “ये धान असम के पारंपरिक उत्पाद हैं और ये कई प्रकार के हैं. हमने जो बैंक बनाया है उससे हम बीज विकसित कर स्थानीय किसानों में बाँट रहे हैं और उन्हें इनकी खेती करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. अगर इन प्रजातियों को किसान उगाने लगते हैं तो फिर हम इनका निर्यात भी कर सकते हैं और यहाँ का किसान ख़ुशहाल हो सकता है."
सिलापथार साइंस कालेज के प्रिंसिपल रंजीत सैकिया का कहना है कि सदियों से असम के किसान, धान के स्थानीय बीज का उत्पादन करते रहे थे लेकिन कुछ सालों से वो बस एक या दो प्रजाति के धन की फसल ही उपजाते हैं. इसलिए कॉलेज ने ऐसे ही बीजों का बैंक बनाया है ताकि धान की ये प्रजातियाँ संरक्षित रह पाएं.
वे कहते हैं, “ये धान असम के पारंपरिक उत्पाद हैं और ये कई प्रकार के हैं. हमने जो बैंक बनाया है उससे हम बीज विकसित कर स्थानीय किसानों में बाँट रहे हैं और उन्हें इनकी खेती करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. अगर इन प्रजातियों को किसान उगाने लगते हैं तो फिर हम इनका निर्यात भी कर सकते हैं और यहाँ का किसान ख़ुशहाल हो सकता है."
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिली चुनावी हार के बाद असम भारतीय जनता पार्टी शासित पहला ऐसा राज्य
है जिसने किसानों के लिए क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की है.
इस क़र्ज़ माफ़ी की योजना को पथुराघाट की घटना के नाम पर बनाया गया है. असम सरकार के प्रवक्ता और मंत्री सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस योजना के तहत उन किसानों का 25 प्रतिशत कर्ज़ माफ़ किया जाएगा जो 75 प्रतिशत क़र्ज़ बैंकों को लौटा देंगे.
असम सरकार के वित्त मंत्री हेमंता बिस्वासरमा के अनुसार राज्य के सिर्फ़ 19 लाख किसानों को ही किसान क्रेडिट कार्ड का फ़ायदा मिल पा रहा है जबकि सरकारी आंकड़ों में राज्य में किसानों की संख्या 27 लाख बताई जाती है. नई क़र्ज़ माफ़ी की योजना के लिए सरकार के खज़ाने से 500 करोड़ रुपये खर्च होने हैं.
लेकिन जानकार मानते हैं कि क़र्ज़ माफ़ी की इस योजना से किसानों को ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि कहते हैं, "किसी ने एक लाख रुपये क़र्ज़ लिया और उसकी फसल किसी वजह से पूरी की पूरी बर्बाद हो गई तो वो क्या करेगा. वो क़र्ज़ के 75 हज़ार रुपये वापस करने की स्थिति में रहेगा, तब तो 25 प्रतिशत माफ़ी के लिए आवेदन देगा, जिसकी पूरी फ़सल बर्बाद हो गई वो कहाँ से क़र्ज़ चुका पायेगा?"
इस क़र्ज़ माफ़ी की योजना को पथुराघाट की घटना के नाम पर बनाया गया है. असम सरकार के प्रवक्ता और मंत्री सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि इस योजना के तहत उन किसानों का 25 प्रतिशत कर्ज़ माफ़ किया जाएगा जो 75 प्रतिशत क़र्ज़ बैंकों को लौटा देंगे.
असम सरकार के वित्त मंत्री हेमंता बिस्वासरमा के अनुसार राज्य के सिर्फ़ 19 लाख किसानों को ही किसान क्रेडिट कार्ड का फ़ायदा मिल पा रहा है जबकि सरकारी आंकड़ों में राज्य में किसानों की संख्या 27 लाख बताई जाती है. नई क़र्ज़ माफ़ी की योजना के लिए सरकार के खज़ाने से 500 करोड़ रुपये खर्च होने हैं.
लेकिन जानकार मानते हैं कि क़र्ज़ माफ़ी की इस योजना से किसानों को ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार रविशंकर रवि कहते हैं, "किसी ने एक लाख रुपये क़र्ज़ लिया और उसकी फसल किसी वजह से पूरी की पूरी बर्बाद हो गई तो वो क्या करेगा. वो क़र्ज़ के 75 हज़ार रुपये वापस करने की स्थिति में रहेगा, तब तो 25 प्रतिशत माफ़ी के लिए आवेदन देगा, जिसकी पूरी फ़सल बर्बाद हो गई वो कहाँ से क़र्ज़ चुका पायेगा?"
असम के किसानों का संघर्ष बहुत पुराना
है. वर्ष 1894 में यहाँ के दर्रांग ज़िले के पथुराघाट में किसानों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन किया था. तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत ने इस आंदोलन को
बुरी तरह कुचल दिया था. इस संघर्ष में 140 किसान मारे गए थे जबकि 150
किसान घायल हुए थे.
हालांकि किसानों की ये कुर्बानी इतिहास के पन्नों में अपनी कोई जगह नहीं बना पाई और देश के बाक़ी के हिस्सों में इसकी कोई चर्चा नहीं सुनाई देती. ये पंजाब के जालियांवाला बाग़ के जैसा ही आंदोलन था. पथुराघाट आंदोलन की पृष्ठभूमि 1826 से ही शुरू हो गई थी जिसके पीछे 'यंदाबो समझौता' है.
हालांकि किसानों की ये कुर्बानी इतिहास के पन्नों में अपनी कोई जगह नहीं बना पाई और देश के बाक़ी के हिस्सों में इसकी कोई चर्चा नहीं सुनाई देती. ये पंजाब के जालियांवाला बाग़ के जैसा ही आंदोलन था. पथुराघाट आंदोलन की पृष्ठभूमि 1826 से ही शुरू हो गई थी जिसके पीछे 'यंदाबो समझौता' है.
पथुराघाट के निवासी और पत्रकार भार्गब
कुमार दास बताते हैं कि इस समझौते के तहत बर्मा ने असम, मणिपुर और इसके आस पास के इलाकों का नियंत्रण ब्रितानी हुकूमत को सौंप दिया था.
इस समझौते के बाद क्षेत्र में 'अहोम राजाओं' के शासन की समाप्ति की घोषणा की गई. जब अंग्रेज़ों ने इलाके की हुकूमत संभाली तो उन्होंने किसानों पर लगान बढ़ा दी. ब्रितानी हुकूमत के इस फैसले के बाद ऊपरी असम में किसानों का ज़ोरदार विरोध शुरू हो गया. राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने पथुराघाट की घटना को मानो भुला ही दिया था.
मगर वर्ष 2000 में भारतीय सेना ने इन शहीद किसानों की याद में एक स्मारक बनाया. वो भी तत्कालीन राज्यपाल जनरल एसके सिन्हा की पहल पर, तब से लेकर आज तक, हर साल 29 जनवरी को भारतीय सेना इन किसानों को श्रद्धांजलि देती आ रही है.
सवाल उठता है कि क्यों इतने सालों के बाद भी असम के किसान संघर्ष ही कर रहे हैं?
इस समझौते के बाद क्षेत्र में 'अहोम राजाओं' के शासन की समाप्ति की घोषणा की गई. जब अंग्रेज़ों ने इलाके की हुकूमत संभाली तो उन्होंने किसानों पर लगान बढ़ा दी. ब्रितानी हुकूमत के इस फैसले के बाद ऊपरी असम में किसानों का ज़ोरदार विरोध शुरू हो गया. राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने पथुराघाट की घटना को मानो भुला ही दिया था.
मगर वर्ष 2000 में भारतीय सेना ने इन शहीद किसानों की याद में एक स्मारक बनाया. वो भी तत्कालीन राज्यपाल जनरल एसके सिन्हा की पहल पर, तब से लेकर आज तक, हर साल 29 जनवरी को भारतीय सेना इन किसानों को श्रद्धांजलि देती आ रही है.
सवाल उठता है कि क्यों इतने सालों के बाद भी असम के किसान संघर्ष ही कर रहे हैं?
असम की राजधानी गुवाहाटी की व्यस्त
चाय गली में आज भी रोज़ की तरह ही हलचल है. यहां रिक्शा और ठेलों का लंबा जाम लगा है, और राहगीरों की लंबी कतारें हैं. लोग यहाँ चाय की चुस्कियां
लेने दूर-दूर से आते हैं. अलग-अलग ज़ायके की चाय इस जगह की पहचान है.
पास ही में है चाय की पत्तियों का थोक बाज़ार. यहीं से पैक होकर आपकी पसंदीदा चाय आप तक पहुँचती है. देश के कोने-कोने से चाय के व्यापारी इस चाय गली की थोक की दुकानों में आते हैं और अपना ऑर्डर देकर चले जाते हैं. फिर ये थोक विक्रेता उन तक चाय पत्ती पहुंचाते हैं.
हालांकि चाय का ये सफ़र उतना आसान भी नहीं है जितनी आसानी से हम अपनी प्याली की चाय गटक जाते हैं. लगभग दस लाख चाय के मज़दूरों की मेहनत के बाद ही हम तक ये पत्तियां पहुँच पाती है.
पहाड़ों और झरनों की गोद में फैले असम के चाय के बगान इस राज्य की प्राकृतिक सुंदरता को निखारते हैं. असम का नाम आते ही दिमाग़ में यहाँ के चाय बगानों की खू़बसूरती और सांस्कृतिक परंपरा की तस्वीर बनने लगती है.
मगर पिछले कई सालों से असम के इन चाय के बगानों में एक असंतोष पनप रहा है. ये असंतोष है मजू़रों का, जो न्यूनतम मज़दूरी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं.
पास ही में है चाय की पत्तियों का थोक बाज़ार. यहीं से पैक होकर आपकी पसंदीदा चाय आप तक पहुँचती है. देश के कोने-कोने से चाय के व्यापारी इस चाय गली की थोक की दुकानों में आते हैं और अपना ऑर्डर देकर चले जाते हैं. फिर ये थोक विक्रेता उन तक चाय पत्ती पहुंचाते हैं.
हालांकि चाय का ये सफ़र उतना आसान भी नहीं है जितनी आसानी से हम अपनी प्याली की चाय गटक जाते हैं. लगभग दस लाख चाय के मज़दूरों की मेहनत के बाद ही हम तक ये पत्तियां पहुँच पाती है.
पहाड़ों और झरनों की गोद में फैले असम के चाय के बगान इस राज्य की प्राकृतिक सुंदरता को निखारते हैं. असम का नाम आते ही दिमाग़ में यहाँ के चाय बगानों की खू़बसूरती और सांस्कृतिक परंपरा की तस्वीर बनने लगती है.
मगर पिछले कई सालों से असम के इन चाय के बगानों में एक असंतोष पनप रहा है. ये असंतोष है मजू़रों का, जो न्यूनतम मज़दूरी और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर संघर्ष करते आ रहे हैं.
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